कोण्डागांव जिला के आदिवासी परिवारों के आर्थिक विकस में लघु वनोपज विपणन संस्थाओं का योगदान

 

बीजू राम1*, सुनील कुमार कुमेटी2

1शोधार्थी, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत ।

2सह-प्राध्यापक, अर्थशाास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत ।

*Corresponding Author E-mail: beejuramnetam94@gmail.com

 

ABSTRACT:

छत्तीसगढ़ के कोण्डागांव जिले में आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख आधार लघु वनोपज है। महुआ, तेंदूपत्ता, इमली, हर्रा, लाख, चिरौंजी, शहद आदि जैसे लघु वनोपज आदिवासी परिवारों की आय, रोजगार और जीवन-निर्वाह के महत्वपूर्ण साधन हैं। भारत में करोड़ों लोग लघु वनोपज के संग्रह और विपणन से रोजगार प्राप्त करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। यह अध्ययन कोण्डागांव जिले के आदिवासी परिवारों में लघु वनोपज विपणन संस्थाओं के योगदान का विश्लेषण करता है। राज्य में लघु वनोपज के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन को व्यवस्थित करने के लिए विभिन्न संस्थाएँ कार्यरत हैं, जिनमें राज्य लघु वनोपज संघ, जिला वनोपज सहकारी संघ, प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियां कार्यरत, वन धन विकास केंद्र और स्वयं सहायता समूह प्रमुख हैं। विपणन के साथ ही वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से वनोपजों का मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की व्यवस्था की जाती है, जिससे कच्चे उत्पादों को तैयार करके उपयोगिक वस्तुओं में बदलकर अधिक आय अर्जित की जाती है। इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य लघु वनोपज संग्राहकों को उचित मूल्य उपलब्ध कराना, बिचौलियों की भूमिका को कम करना तथा आदिवासी परिवारों की आय में वृद्धि करना है। अतः यह कहा जा सकता है कि लघु वनोपज विपणन संस्थाएँ कोण्डागांव जिले के आदिवासी परिवारों के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इनके प्रभाव से आय में वृद्धि, रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण तथा सतत् वन प्रबंधन को प्रोत्साहन मिला है। भविष्य में यदि इन संस्थाओं को बेहतर बाजार संपर्क, प्रसंस्करण सुविधाएँ और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो यह आदिवासी समुदाय की आजीविका और ग्रामीण विकास को और अधिक सुदृढ़ कर सकती हैं। प्रस्तुत शोध अध्ययन प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़ो का संकलन प्रत्यक्ष अनुसूची एवं द्विस्तरी निदर्शन विधि की सहायता से किया गया है। अध्ययन में कोण्डागांव विकासखण्ड के 15 गांव में 120 परिवार को दैव निदर्शन विधि की सहायता से लिया गया है।

 

KEYWORDS: आदिवासी, लघु वनोपज, विपणन में योगदान ।

 

 


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छत्तीसगढ़ राज्य में लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संस्था त्रिस्तरीय संरचना का रूप रेखा है। जिसके कार्य क्षेत्र में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य कार्य करता है। इसके अंतर्गत 902 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियां एवं 31 जिला वनोपज सहकारी संघ कार्यरत है। राज्य में 44 प्रतिशत क्षेत्र वनभूमि से फैला हुआ होने के कारण यहां पर लघु वनोपज का बाहुल्य है। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित रिपार्ट के लगभग 13.50 लाख परिवार लघु वनोपज संग्रहण से आय प्राप्त करते हैं। जिसमें अधिकांश गरीब एवं आदिवासी है। राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ का यह लक्ष्य है कि लघु वनोपज संग्रहित परिवार एवं आदिवासी परिवार के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को पूर्ण करना है।

छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित द्वारा वनांचलों में निवासरत समुदाय द्वारा संग्रहित राष्ट्रीयकृत एवं अराष्ट्रीयकृत वनोत्पादों को उचित मूल्य पर खरीदी का कार्य करता है। जिसमें आदिवासियों व वनों के आस-पास निवासरत अन्य समुदाय को जीविकोपार्जन का महत्वपूर्ण आधार प्राप्त होता है। जबकि पूर्व में स्थानीय व्यापारियों के द्वारा कम मूल्य एवं नमक के बदले में वनोपजों की खरीदी की जाती थी। इस समस्या को ध्यान में रखते हुऐ भारत सरकार जनजातीय कार्य मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना लागू की गई है। योजना के अन्तर्गत पूर्व में छत्तीसगढ़ राज्य के लघु वनोपज संघ द्वारा वर्ष 2018-19 में 07 लघु वनोपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही क्रय किया जाता था जिसे वर्ष 2023 में बढ़ाकर 65 वनोपज किया गया है साथ ही संघ द्वारा निर्धारित दर पर 65 वनोपज की खरीदी की जा रही है इस प्रकार महिला स्व सहायता समूहों द्वारा 65 प्रकार के वनोपज खरीदी की जा रही है। खरीदी की जाने वाले लघु वनोपजों में कोदो, कुटकी (कोसरा), रागी (मड़िया), अमचूर एवं कोसा (कुकन) आदि महत्वपूर्ण वनोत्पाद को सम्मिलित किया गया।

 

तालिका क्रं. 1: वित्तीय वर्ष वार वनोपज संग्रहण प्रगति

क्र.

वित्तीय वर्ष

वनोपज संख्या

संग्रहित मात्रा क्विंटल में

संग्रहण मूल्य करोड़ में

1

2018-19

7

5400

3.81

2

2019-20

17

75188

16.5

3

2020-21

53

640929

153.69

4

2021-22

58

415904

119.93

5

2022-23 (01 अप्रैल से 30 नवंम्बर 2022 की स्थिति में)

65

143880.28 रैली कोसा - 1955878

51.14

योग

1278301

245.07

स्रोत:- छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित।

 

उपलब्ध शोध साहित्यों की समीक्षा:-

हासलकर, सुमा एवं जाधव (2004)1 ने “Role of Women in the use of Non Timber Forest Prodce- A Review”, प्रस्तुत शोध अध्ययन द्वितीयक समंको पर आधारित है शोध अध्ययन में लघु वनोपज एवं औषधीय लघुवनोपज ग्रामीणों की आय एवं जीविका का प्रमुख स्त्रोत है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं लघुवनोपज की प्रमुख संग्राहक है, जिनका अधिकांश समय वनोपज संग्रहण में व्यतीत होता है। लघु वनोपजों के संग्रहण से महिलाएं अपने परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। वनोपजों के विपणन द्वारा प्राप्त आय पारिवार के लिए महत्वपूर्ण होता है। महिलाओं का वनों से भावनात्मक लगाव एवं वानिकी संबंधी ज्ञान को देखते हुए, उन्होंने लघुवनोपज आधारित लघु उपक्रमों से महिलाओं को जोड़ने का सुझाव दिया है ताकि महिलाएं अपने पारिवारिक आय अर्जन एवं संवर्धन में योगदान दे सकें। उन्हे इन उपक्रमों के प्रबंधन एवं विकास हेतु प्रषिक्षण देने की बात कही

 

सत्यपालन, ज्योतिष (2005)2 ने “Household's dependence on Protected Forest Evidence from the Western Ghats”, शोध अध्ययन में केरल के संरक्षित वन क्षेत्र पेरियार टाईगर रिर्जव में भारत पर्यावरण विकास प्राधिकरण द्वारा विश्व बैंक की सहायता से प्रायोजित एकल समय बिन्दु पद्धति पर आधारित है। कि संरक्षित वन एवं इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के पास मानसून आधारित परंपरागत कृषि पद्धति, न्यूनतम मजदूरी दर, वैकल्पिक आय के अवसरों की कमी है। जिसके कारण अपने ये परिवार अपनी जीविकोपार्जन एवं आय हेतु वन एवं वनोपजों पर अत्यधिक निर्भर हैं। लागित प्रतीपगमन विश्लेषण द्वारा निदर्श परिवारों की वनोपजों पर निर्भरता ज्ञात करते हुए उन्होंने पाया कि वन प्रबंधन की नई नीति के प्रति गरीब परिवारों का सकारात्मक दृष्टिकोण है। एवं प्रति व्यक्ति न्यूनतम आय वर्ग वाले, बड़े आकार के परिवार लघुवनोपजों पर उच्च आय वर्ग वाले परिवारों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक निर्भर रहते हैं। भूमि पर जनसंख्या के बढ़ते हुए दबाव को कम करने, रोजगार अवसरों की तलाश में होने वाले प्रवसन पर नियंत्रण तथा आय एवं रोजगार के अवसरों में वृद्धि हेतु उन्होंने संरक्षित वन क्षेत्रों के प्रबंधन की गई वन नीति (संयुक्त वन प्रबंधन) को अपनाने का सुझाव दिया ।

 

मिश्रा, वत्सला (2008)3 ने “वनोपज द्वारा आय एवं रोजगार सृजन (बस्तर जिले के विशेष संदर्भ में)“, शोध में बस्तर जिले में वनोपज द्वारा कैसे आय एवं रोजगार सृजन किया जाए इसका अध्ययन किया है। इस अध्ययन का उद्देश्य उपलब्ध लघु वनोंपजो के संग्रहण, उपभोग एवं विपणन संबंधी समस्या, विपणन पद्धति, विपणन में संलग्न संस्थाओं की भूमिका एवं उससे संबंधित आय एवं रोजगार की संभावनाओं का पता लगाना था। इन्होंने लघु वनोपज संग्रहण तथा परिवार की मौद्रिक आय एवं रोजगार के बीच धनात्मक संबंध की परिकल्पना के आधार पर अध्ययन कर पाया कि लघुवनोपज का जनजातियों की आय एवं रोजगार में महत्वपूर्ण योगदान होता है। अपने अध्ययन क्षेत्र में जिले के चारों मुख्य कृषि मंडियों जगदलपुर, कोण्डागांव, केशकाल, एवं नारायणपुर के अन्तर्गत आने वाले ग्रामों के हाट बाजारों के क्षेत्रों को चुनाव किया, और पाया कि समग्र मंडी क्षेत्र के न्यादर्श  परिवारों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में अत्यधिक समानताएँ हैं। परिवार का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं वनोपज संग्रहण है। सिंचाई सुविधाएँ न होने के कारण कृषि पूर्णतया मानसून पर आधारित है। निदर्श परिवार आज भी मुद्रा का सही उपयोग नही जानते, अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण माप-तौल रूपया की सही गिनती आदि जानकारी न होने के कारण बिचौलियों एवं व्यापारी सरलता से इनके भोलेपन का फायदा उठाकर शोषण करते हैं। इन्होंने ग्रामीणों को लघुवनोपजों के अतिक्ति वर्ष भर सतत् रोजगार उपलब्ध कर जनजातियों के आय एवं रोजगार सृजन का सुझाव दिया।

 

रात्रे, ममता (2021)4 ने “जनजातीय समुदाय में वनोंपज संकलन का विश्लेषण (छ.ग. राज्य की मुरिया जनजाति के वनोंपज संकलन में परिवर्तन के विशेष संदर्भ में)“, अपने अध्ययन वनोपज संकलन में परिवर्तन का समाजशास्त्रीय आधारित है। शोध प्रविधि दैव निदर्शन के लॉटरी प्रणाली से चार गाँव को चयन किया गया है। शोध का उद्देश्य वनोपज संकलन की पृष्ठभूमि का अध्ययन करना। वनोपज संकलन में परिवर्तन को ज्ञात करना। अध्ययन का महत्व मुरिया जनजाति पिछड़ी हुई जनजाति है। मनोवैज्ञानिकों, मानवशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों जैसे वेरियर एल्विन, लाल जगदलपुरी, केदारनाथ ठाकुर, रसल एवं हीरालाल द्वारा सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक का अध्ययन किया है। प्रस्तुत शोध अध्ययन का निष्कर्ष उत्तर दाताओं द्वारा वनोपज संग्रहण के अन्तर्गत शहद, चिरौजी, साल बीज, हर्रा, कन्दमूल, सीताफल, जामुन, आम, तिखुर, इमली, चार, लाख, आँवला, तेन्दू, मशरूम, बास्ता, एवं महुआ बीज, महुआ का संग्रहण शत प्रतिशत किया जाता है। शोध का सुझाव वनोपज संकलन, आवागमन साधन, अधिकार क्षेत्रों का सुधार का सुझाव दिया है।

 

महत्व:-

लघु वनोपज विपणन संस्थाओं का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वे आदिवासी संग्राहकों को उनके उत्पादों का उचित और स्थिर मूल्य दिलाने में सहायता करती हैं। पहले बिचौलियों के कारण आदिवासी संग्राहकों को कम कीमत मिलती थी, लेकिन सहकारी समितियों और सरकारी संस्थाओं के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद होने से उनकी आय में वृद्धि हुई है और इन संस्थाओं की मदद से महिलाएँ भी वनोपज संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन करने, सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने और सतत् आजीविका सुनिश्चित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

 

उद्देश्य:-

1.  अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध वनोपज विपणन संस्थाओं का अध्ययन करना।

2.  अध्ययन क्षेत्र में वनोपज विपणन संस्थाओं की विपणन प्रणाली में योगदान।

 

शोध प्राविधि:-

प्रस्तुत शोध अध्ययन प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़ो का संकलन प्रत्यक्ष अनुसूची एवं द्विस्तरी निदर्शन विधि की सहायता से किया गया है। वनोपज संग्रहण, विपणन व्यवस्था एवं जनजातीय परिवारों में वनोपज से आर्थिक विकास के अध्ययन के लिए चयनित कोण्डागांव जिला के एक विकासखण्ड है। अध्ययन में कोण्डागांव विकासखण्ड के 15 गांव में 120 परिवार को दैव निदर्शन विधि की सहायता से लिया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र:-

प्रस्तुत अध्ययन में छत्तीसगढ़ के कोण्डागाँव जिला से संबंधित है। कोण्डागाँव प्राचीनकाल से ही आदिवासियों का प्राकृतिक आवास रहा है। कोण्डागाँव छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण में स्थित आदिवासी बहुल जिला है। कोण्डागांव जिले का  गठन सन् 01 जनवरी 2012 में हुआ। कोण्डागांव जिला में पांच विकासखण्ड के अंतर्गत 583 गांव हैं। 2011 की जनगणना अनुसार यहाँ की कुल जनसंख्या 5.78 लाख है। जिसमें पुरूषों की संख्या 28.48 लाख (49.19 प्रतिशत) एवं महिलाओं की संख्या 29.40 लाख (50.80 प्रतिशत) है। साक्षरता दर 57.3 प्रतिशत तथा लिंगानुपात 1033 है। यहाँ की कुल आबादी में आदिवासियों की जनसंख्या 4.11 लाख है जो कुल आबादी का 71.01 प्रतिशत है। जिसमें पुरूषों की संख्या 2.01 लाख (48.88 प्रतिशत) और महिलाओं की संख्या 2.10 लाख (51.11 प्रतिशत) है, तथा लिंगानुपात 1046 है। कोण्डागाँव जिला की अधिकांश जनजातियां भी विश्व की अधिकांश जनजातियों की भांति अपनी जीविकोपार्जन के लिए कृषि, वनोपज एवं शिल्प कलाओं पर निर्भर हैं। इन जनजातियों में पुरूषों की तुलना में महिलाएँ लघु वनोपजों के संग्रहण से लेकर विपणन तक समस्त क्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध वनोपज विपणन संस्थाओं का अध्ययन:

प्रस्तुत शोध अध्ययन क्षेत्र में वनोपज विपणन संस्थाएँ निम्न है। जैसे कि अध्ययन क्षेत्र में सहकारी संस्था, बिचौलियां व्यवस्था, हाट बाजार, ग्राम की समूह, हाट बाजार समूह एवं प्राथमिक उपभोक्ताओं आदि प्रकार की संस्थाएँ है। अध्ययन क्षेत्र में कितनी और किस प्रकार की व्यवस्था है। न्यादर्शाओं द्वारा प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र की गतिविधियों को प्रस्तुत किया गया है।

 

तालिका क्रं. 2: अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध विपणन संस्थाओं की जानकारी - (15)

क्र.

संस्था

संख्या

प्रतिशत

1

हाँ

12

80

2

नहीं

3

20

कुल योग

15

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका क्र. 2 में अध्ययन क्षेत्र के लघु वनोपज विपणन संस्थाओं अध्ययन किया गया है जिसमें से ज्ञात होता है कि 15 गांवों में 80.00 प्रतिशत (12) गांवों में विपणन संस्था उपलब्ध है व 20.00 प्रतिशत (3) गांवों में लघु वनोपज विपणन संस्था उपलब्ध नहीं है।

 

तलिका क्र. 3: अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध विपणन संस्थाओं की जानकारी गाँव में - (15)

क्र.

संस्थाएँ

हाँ

प्रतिशत

नहीं

प्रतिशत

1

सहकारी संस्था

8

53.33

7

46.67

2

बिचौलियों

10

66.67

5

33.33

3

हाट बाजार

12

80

3

20

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका क्र. 3 में अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध लघु वनोपज विपणन संस्थाओं का अध्ययन किया गया है। सबसे अधिक 80 प्रतिशत (12) गांवों में हाट बाजार संस्था है। 66.67 प्रतिशत (10) गांवों में बिचौलियों संस्था व सबसे कम 53.33 प्रतिशत (8) गांवों में सहकारी संस्था है।

 

तलिका क्र. 3: न्यादर्श परिवार से लघु वनोपज विक्रय से संबंधित जानकारी - (120)

क्र.

विक्रय

संख्या

प्रतिशत

1

साप्ताहिक

2

1.67

2

मासिक

4

3.33

3

वार्षिक

69

57.5

4

कभी-कभी

45

37.5

कुल योग

120

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका क्र. 3 से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में लघु वनोपज विक्रय का अध्ययन किया गया है। जिसमें सबसे अधिक 57.50 प्रतिशत (69) परिवार वार्षिक विक्रय करते हैं, 37.50 प्रतिशत (45) परिवार कभी-कभी विक्रय करते हैं, 3.33 प्रतिशत (4) परिवार मासिक विक्रय करते हैं, और सबसे कम 1.67 प्रतिशत (2) परिवार साप्ताहिक विक्रय करते हैं। न्यादर्श परिवार सबसे अधिक वार्षिक विक्रय करता है और विक्रय सबसे कम साप्ताहिक विक्रय करता है।

 

तलिका क्र. 4 संग्रहित लघु वनोपज को अधिकांश रूप में विक्रय - (120)

क्र.

संस्था

संख्या

प्रतिशत

1

सहकारी संस्थाा में

17

14.17

2

बिचौलियों के पास

30

25

3

हाट बाजार में

60

50

4

प्राथामिक उपभोक्ताओं के पास

13

10.83

कुल योग

120

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका क्र. 4 में संग्रहित लघु वनोपज को अधिकांश रूप में विक्रय का अध्ययन किया गया है। जिसमें 50.00 प्रतिशत (60) परिवार हाट बाजार में लघु वनोपज विक्रय करते हैं, 25.00 प्रतिशत (30) परिवार बिचौलियों के पास विक्रय करते हैं, 14.17 प्रतिशत (17) परिवार सहकारी संस्था में विक्रय करते हैं, और 10.83 प्रतिशत (13) परिवार प्राथामिक उपभोक्ताओं के पास विक्रय करते हैं। न्यादर्श परिवार सबसे अधिक हाट बाजार में विक्रय करते है और सबसे कम प्राथामिक उपभोक्ताओं के पास विक्रय करते हैं।

 

 

 

तलिका क्र. 5 संग्रहित लघु वनोपजों के विक्रय से उचित कीमत प्राप्त का विवरण - (120)

क्र.

संस्था

संख्या

प्रतिशत

1

सहकारी संस्थाा में

43

35.83

2

बिचौलियों के पास

17

14.17

3

हाट बाजार में

35

29.17

4

प्राथामिक उपभोक्ताओं के पास

25

20.83

कुल योग

120

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका क्र. 5 में संग्रहित लघु वनोपजों के विक्रय से उचित कीमत प्राप्ति का विवरण को प्रदर्शित किया गया है जिसमें 35.83 प्रतिशत (43) न्यादर्श परिवार को सहकारी संस्था से प्राप्त होती है, 29.17 प्रतिशत (35) न्यादर्श परिवार को हाट बाजार से प्राप्त होती है, 20.83 प्रतिशत (25) न्यादर्श परिवार को प्राथामिक उपभोक्ताओं से प्राप्त होती है और 14.17 प्रतिशत न्यादर्श परिवार को बिचौलियों से प्राप्त होती है। सबसे अच्छी मूल्य की प्राप्ति 35.83 प्रतिशत (43) सहकारी विपणन संस्था से प्राप्त होती है और सबसे कम मूल्य 14.17 प्रतिशत (17) बिचौलियों से प्राप्त होती है।

 

तलिका क्र. 6: लघु वनोपज विपणन की सहकारी संस्था खुलने के पूर्व की विपणन स्थिति -(120)

क्र.

पूर्व की स्थिति

संख्या

प्रतिशत

1

अच्छी थी

12

10

2

अच्छा नहीं थी

108

90

कुल योग

120

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तालिका क्र. 6 में लघु वनोपज विपणन संस्था खुलने के पहले की विपणन स्थिति का अध्ययन किया गया है जिससे में 10 प्रतिशत (12) न्यादर्श परिवार की विपणन स्थिति अच्छी थी 90 प्रतिशत (108) परिवार की विपणन स्थिति अच्छी नहीं थी।

 

तलिका क्र. 7: लघु वनोपज विपणन संस्था खुलने के बाद की विपणन स्थिति - (120)

क्र.

बाद की स्थिति

संख्या

प्रतिशत

1

अच्छी है

45

37.50

2

अच्छी नहीं है

75

62.50

कुल योग

120

100

स्रोत:- प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित।

 

तलिका में लघु वनोपज विपणन संस्था खुलने के बाद की विपणन स्थिति का अध्ययन किया गया है। जो की विपणन संस्था खुलने के बाद भी 37.50 प्रतिशत (45) परिवार की विपणन स्थिति अच्छी है जिसमें से 63.50 प्रतिशत (75) परिवार की विपणन स्थिति अच्छी नहीं है।

 

निष्कर्ष:-

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि लघु वनोपज विपणन संस्थाओं ने आदिवासी संग्राहकों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सहकारी समितियाँ, वन धन विकास केंद्र, स्वयं सहायता समूह तथा राज्य लघु वनोपज संघ जैसी संस्थाओं के माध्यम से वनोपज का संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन अधिक संगठित और व्यवस्थित हुआ है। इन संस्थाओं के माध्यम से आदिवासी परिवारों को उनके द्वारा एकत्रित वनोपज का उचित मूल्य प्राप्त होने लगा है, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है। साथ ही, बिचौलियों की भूमिका में कमी आई है और आदिवासी संग्राहकों को सीधे बाजार से जुड़ने का अवसर मिला है। महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ने से महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिला है। इसके अतिरिक्त, लघु वनोपज के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की व्यवस्था से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए हैं। इससे न केवल आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है बल्कि ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विकास को भी गति मिली है। लघु वनोपज विपणन संस्थाएँ कोण्डागांव जिले के आदिवासी परिवारों के सामाजिक-आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और सतत् आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भविष्य में यदि इन संस्थाओं को बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक और व्यापक बाजार सुविधाएँ प्रदान की जाएँ, तो आदिवासी समुदाय का अधिक विकास हो सकता है।

 

सुझाव:-

1.  लघु वनोपज को सुरक्षित भंडारण और उचित परिवहन के लिए गोदाम और परिवहन सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए।

2.  लघु वनोपज से बने उत्पादों को पैकेजिंग प्रसंस्करण के लिए स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग स्थापित किए जाने चाहिए।

3.  संग्रहित परिवारों को लघु वनोपजों के संग्रहण, संरक्षण, प्रसंस्करण और विपणन से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिससे वे बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद तैयार कर सके।

4.  संग्रहकों को बिचौलियों से बचाने के लिए विपणन संस्थाओं के माध्यम से सीधे बाजार से जोड़ने की व्यवस्था को और मजबूत किया जाना चाहिए।

5.  डिजीटल प्लेटफॉम और ऑनलाइन मार्केटिंग के माध्यम से लघु वनोपज उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुँचाया जा सकता है।

6.  सरकार द्वारा संचालित योजनाओं और संस्थाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन होना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक संग्रहित परिवारों का इसका लाभ मिल सके।

 

सन्दर्भ सूची:-

1.      Hasalkar Suma, Veena Jadhav (2004), “Role of Women in the use of non timber forest produce, A review”, Journal of social Science 2004 Vol. 8 No (3) PP.203-206.

2.    Sathya Palana Jyothis (2005), “Household’s dependent on protected forest Evidence from the Western Ghats”, Indian Journal of Agricultural Economic Jan-March 2005 Vol. 60 No. (1) PP 60-70.3.

3.    मिश्रा, वत्सला (2008), “वनोपज द्वारा आय एवं रोजगार सृजन (बस्तर जिले के विशेष संदर्भ में)“, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर की सामाजिक विज्ञान संकाय के अन्तर्गत अर्थशास्त्र विषय में पी-एच.डी. उपाधि हेतु पस्तुत।

4.    रात्रे, ममता (2021),“जनजातीय समुदाय में वनोंपज संकलन का विश्लेषण (छ.ग. राज्य की मुरिया जनजाति के वनोंपज संकलन में परिवर्तन के विशेश संदर्भ में)“, International Journal of Reviews and Research in Social Sciences, April-June 2021, ISSN: 2347-5145 (Print), 2454-2687 (Online), Vol.09, Issue-02.

5.    छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित।

 

 

Received on 20.01.2026      Revised on 14.02.2026

Accepted on 15.03.2026      Published on 17.03.2026

Available online from March 20, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):67-72.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00015

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